कहानी एक मजबूर बेटे की 2

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प्रेषक : शाहिद
दोस्तों यह कहानी है “कहानी एक मजबूर बेटे की 1” से आगे की . . .
तो दोस्तों अम्मी जी सुबह से काफ़ी परेशानी में इधर उधर फिर रही थी आख़िर मैंने पूछ ही लिया क्या  बात है. वो बोली बेटा आज सुबह से ही मेरी कमर मैं दर्द है रेहाना भी नही है वरना वो थोड़ी

सी मालिश कर देती अगर तुम कर दो तो लेकिन मैं जानती हूँ तुम्हे माँ का ख्याल कहाँ है. अच्छा अच्छा हर वक़्त गुस्सा ना करती रहा करो चलो. अम्मी जी अपने बेड पर उल्टा लेट गयी   मैंने उनकी कमीज़ थोड़ी सी उपर उठाई और आहिस्ता आहिस्ता मालिश करने लगा के मेरी नज़र अम्मी जी के कुल्हो की तरफ गयी जहाँ से सलवार थोड़ी सी नीचे गयी हुई थी पहली दफ़ा उस वक़्त मुझे दिल मैं कुछ महसुस हुआ और मेरा लंड खड़ा हो गया. अब अम्मी जी ने अपनी कमीज़ और उपर कर ली और उनका सफेद ब्रा नज़र आने लगा. मुझे पसीना आ गया और शायद अम्मी जी ने भी यह बात महसूस कर ली और मुझे कहा शाहिद क्या हुआ ए.सी चालू  कर लो अगर गर्मी है तो और फिर वो मुस्कुरा दीं. और फिर अचानक वो उठ कर बेठ गयी  और बोली शाहिद एक बात कहूँ अगर गुस्सा ना करो तो.

मेरे उस वक़्त वेसे ही पसीने छूट रहे थे मैंने कहा बोलीये. तुम शादी कर ही लो. आप फिर. तुम फिर गुस्सा हो रहे हो. वेसे भी तुम्हारी यह हालत देख कर ही मैं तुम्हे सुझाव दे रही हूँ. कोन सी हालत मैंने अंजान बनते हुये कहा. उन्होने मेरे बाल ठीक करते हुये कहा बेटा मैं तुम्हारी माँ हूँ मैं सब जानती हूँ. आप पता नही क्या जानती हैं मुझे कुछ समझ नही आ रहा और मैं शर्मिन्दगी छुपाने के लिये कमरे से बाहर आ गया. और पूरा दिन अपने कमरे मैं बेठा रहा और सोचता रहा यह सब अम्मी जी क्यो कह रही हैं. शाम को अम्मी जी मेरे कमरे मैं आईं और बोली शाहिद क्या हुआ आज तुम ने खाना भी नही खाया. सुबह से कमरे मैं बेठे हो. कुछ नही शान्ति से कमरे मैं तो बेठने दो। अरे बेटा मैंने तो ऐसे ही पूछ लिया था. तुम तो हर वक़्त नाराज़ ही रहते हो. चलो आओ बाहर कुछ खा लो. अच्छा चलो.  अम्मी जी ने मुझे कुछ खाने को दिया और खुद मेरे पास बेठ कर मुझे देखने लगी. मैं बोला अब आप मुझे क्यो घूर रही है. नही मैं तो सिर्फ़ कहना चाहती थी तुम्हे पेसे तो नही चाहिये. पेसे किस को नही चाहिये. अच्छा ठहरो और वो अंदर चली गयी और वापस आ कर मुझे 5 हज़ार रुपए दिये. मैं हेरान हो कर उन्हें देखने लगा. तो वो बोलीं मैंने सोचा तुम्हे ज़रूरत होगी. शुक्र है आप को भी यह एहसास हुआ.

 

बेटा मुझे तो शुरु से ही एहसास है बस तुम ही. अच्छा ठीक है सुन लिया और मैं पेसे ले कर बाहर निकल गया. पीछे से अम्मी जी की आवाज़ आई जल्दी वापस आ जाना मैं अकेली हूँ. मैं रात को देर से वापस आया. अम्मी जी मेरा इंतज़ार कर रही थी वो बोलीं तुम्हे समझ में नही आता मैंने कहा था जल्दी आना. और उन्होने मुझे थोड़ा सा डाट दिया. और मैं गुस्से मैं अपने कमरे मैं चला गया. वो थोड़ी देर बाद मेरे कमरे मैं आईं और कहा चलो खाना खा लो और आज मेरे कमरे मैं ही सो जाना. मैं गुस्से से बोला मुझे खाना नहीं खाना है और ना ही आप के कमरे मैं सोना है आप चली जाओ मेरे कमरे से मैंने यह सब काफ़ी ऊँची आवाज़ मैं कहा.

 

ऐसे वक़्त मैं रेहाना मुझे राज़ी कर लेती थी लेकिन आज वो भी नही थी. अगले दिन मैं सो कर उठा तो रेहाना वापस आ चुकी थी. उसने मुझे सलाम किया और मेरे सर पर थप्पड़ मार कर भाग गयी शरारत से. मैं भी उसके पीछे भागा. उसके बाद हम दोनो ने नाश्ता किया. उस दिन के बाद अम्मी जी बहुत कम बोलती और ज्यादा वक़्त खामोश ही रहती. बल्कि वो रेहाना से भी कम ही बात करती. मैं अपनी मन मर्ज़ी करता रहा और उन्होने अब मुझे क़िसी भी बात पर मना करना और समझाना भी छोड़ दिया. यानी मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया लेकिन रेहाना मुझे बताती थी की अकेले मैं अम्मी जी रोती रहती हैं की मैं उनकी बात नही सुनता. खैर इसी तरह दिन गुज़रते रहे और मैं कॉलेज जाने लगा. रेहाना भी 12वी मैं चली गयी .  

फिर एक दिन अम्मी जी और रेहाना दो दिन के लिये हमारे एक दूर के रिश्तेदार चकवाल में रहते हैं दो दिन के लिये उनके पास गये। उन के क़िसी बेटे की शादी थी. खैर दो दिन बाद अम्मी जी और रेहाना शाम के वक़्त वापस आ गये. उनकी वापसी के बाद कुछ दिन से मैं अम्मी जी मैं काफ़ी चेंजिंग देख रहा था. पहले वो बहुत चुप रहने लगी थी लेकिन अब अचानक वो फिर पहले की तरह बोलने लगी बल्कि पहले से भी ज़्यादा लेकिन अब वो मुझे क़िसी काम से भी रोकती नही थी मैं जो चाहता करता. मैं काफी हेरान था लेकिन जो था अच्छा ही था. फिर एक दिन जब रेहाना स्कूल गयी हुई थी अम्मी जी मेरे कमरे मैं आईं और मेरे पास बेठ गयी और बोलीं. शाहिद बेटा क्या कर रहे हो. कुछ नही मैंने कहा. 

अम्मी जी : आज मुझे तुम से बहुत ज़रूरी बात करनी है. 

शाहिद : जी बोलीये. 

अम्मी जी : बात ये है बेटा नाराज़ ना होना. आज जो बात मेरे दिल मैं है मैं तुम्हे सच सच बताना चाहती हूँ आगे तुम्हारी मर्ज़ी तुम जो चाहे कहो. 

 शाहिद : आप बोलीये क्या बात है. 

अम्मी जी : बेटा तुम्हारे बाप को मरे काफ़ी वक़्त गुज़र गया है और मैं अकेली हूँ हाँ ये सच है की मैं तुम्हारी माँ हूँ लेकिन यह भी सच है की मैं एक औरत हूँ और एक इंसान हूँ मेरी भी कोई खुशी है मेरे एक दिल भी है जो धड़कता भी है. मेरी भी पसंद और ना पसंद है. 

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शाहिद : हाँ जी वो तो ठीक है लेकिन आप ये सब मुझे क्यो बता रही हैं. 

अम्मी जी : इसलिये बेटा की तुम्हे समझाने की मैंने बहुत कोशिश की लेकिन तुम समझे ही नही इसलिये अब मुझे सब कुछ तुम्हे खुद बोलना पड़ेगा. 

शाहिद : अब बता भी दो. 

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अम्मी जी : अच्छा एक बात सच सच बताओ बिना क़िसी शर्म के. यह बताओ तुम जवान हो क्या कभी तुम ने क़िसी लड़की से कुछ किया है. 

शाहिद : यह आप क्या कह रही हैं. मैंने हेरान होते हुए पूछा. 

अम्मी जी : अच्छा छोड़ो क्या तुम क़िसी बड़ी उम्र की औरत से कुछ ऐसा करना पसंद करते हो. 

शाहिद : जी क्या. यह आप क़ेसी बाते कर रहीं हैं. की अचानक अम्मी जी ने अपना हाथ मेरी पेन्ट पर मेरे लंड पर रख दिया. मुझे अचानक झटका लगा. मुझे कुछ समझ नही आ रही था  की क्या करूँ मेरी आवाज़ ही नही निकल रही थी. 

मैं इसी तरह खामोशी से बेठा रहा और अम्मी जी मेरे लंड को मसलती रही पेन्ट के उपर से ही. अब मेरे बर्दाश्त से बाहर होये जा रहा था में सब भूल जा रहा था की यह मेरी माँ है. मैं पागल होया जा रहा था. मैंने अम्मी जी के बोबो को चाटना शुरु कर दिया. मैं बेड पर लेट गया और अम्मी जी मेरे उपर लेट गयी और मेरे पूरे जिस्म को चाटना शुरु कर दिया उसके बाद उन्होने  मेरी पेन्ट की चैन खोली और अपना हाथ अन्दर डाल दिया और मेरे लंड को मसलना शुरु कर दिया. अम्मी जी और मैं हम दोनों पागल हो रहे थे. फिर अम्मी जी ने मेरे सारे कपड़े उतार दिये और अपने भी। अब मैं बिल्कुल नंगा था अम्मी जी सिर्फ़ ब्रा और पेन्टी मैं थी.  

मैंने उनकी पेन्टी और ब्रा उतार दिये अब उनके बड़े बड़े बूब्स लटकने लगे. और उनकी चूत पर थोड़े थोड़े बाल थे. उन्होंने मेरा मुँह अपने बूब्स के साथ लगा दिया मैं उनके बूब्स को चाटने लगा और मुँह मैं डालने लगा. फिर मैंने उनके पूरे जिस्म पर शहद डाला और उनका पूरा जिस्म चाटा फिर अम्मी जी ने भी ऐसा ही किया. मैंने उन्हें सीधा लेटा कर उन की चूत मैं अपना लंड डाला. और उनके मुँह मैं अपना मुँह डाल कर किस करने लगा और मेरा हाथ उनके बोबो पर था. हम 2 घंटे तक एक दूसरे के साथ खेलते रहे फिर रेहाना के स्कूल से वापस आने का वक़्त हो गया इसलिये अम्मी जी ने मुझे कहा अब बस करते हैं और वो कपड़े पहन कर बाहर चली गयी . 

मैंने भी अपने कपड़े पहने. लेकिन मैं बाहर नहीं गया बल्कि अपने कमरे मैं ही बेठा रहा. थोड़ी देर बाद रेहाना भी आ गयी. मुझे अभी तक यक़ीन नही आ रहा था की मैने ये क्या किया है और वो भी अपनी माँ के साथ. मैं पूरा दिन कमरे मैं बेठा रहा कुछ शर्मिन्दगी भी थी. लेकिन मज़ा भी तो बहुत आया था. शाम को अम्मी जी मेरे कमरे मैं आईं और बोली क्या हुआ शाहिद बाहर क्यो नही आ रहे. उन्होंने मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखा. क्या यह जो कुछ हुआ ये सच था मैंने पूछा. हाँ क्यो तुम्हे कोई शक है या तुम्हे मज़ा नही आया. नही तो ऐसी तो कोई बात नही. चलो फिर बाहर आओं अम्मी ने कहा. 

शाहिद : मैं बोला अच्छा यह बताओं क्या हम दुबारा भी यह करेगे. 

अम्मी जी : क्यो तुम नही चाहते ये सब करना 

मैं तो चाहता हूँ तो फिर ज़रूर करेगे मुझे तुम्हारी खुशी पसन्द है. और मुझे आप की. मेरे बेटा  और अम्मी जी ने मुझे चूम लिया. अगले दिन सुबह मैं जल्दी उठा और किचन मैं जा कर देखा   अम्मी जी नाश्ता बना रही थी मैंने पीछे से जा कर उन्हे कमर से पकड़ लिया और दबा लिया और उनके गाल पर प्यार करते हुये बोला क्या बना रहीं हैं. तुम्हारे लिये नाश्ता बना रही हूँ. लेकिन मैं नाश्ता सिर्फ़ एक शर्त पर करूँगा आप भी मेरे साथ खायेगी. अच्छा चलो फिर. फिर एक निवाला अम्मी जी खाती और एक मुझे खिलाती और चाय का एक घूँट वो लेती और उसी कप से एक घूँट मैं लेता. अब मैं बहुत बदल गया था अम्मी जी मुझे जो काम भी कहती मैं भाग कर करता और उनकी हर बात मानता. एक दिन अम्मी जी ने मुझे खुद बताया मैंने जब तुम्हे समझाने की बहुत कोशिश की और तुम्हे अपनी तरफ ध्यान देने की भी लेकिन तुमने ध्यान नही दिया. फिर जब मैं एक शादी में गयी वहाँ मुझे मेरी एक पुरानी सहेली मिली मैने  सारी बात उसको बताई तो उसने मुझे कहा की खुल कर उससे बात करो और बिना डरे उसे अपना जिस्म दो फिर देखना वो तुम्हारा गुलाम बन जायेगा और जो तुम कहोगी वो मानेगा.  

मैंने उसी दिन फेसला कर लिया जो होगा देखा जायेगा. वेसे भी रोज़ रोज़ मरने से बेहतर है एक बार ही कोशिश की जाये फिर आर या पार. और मुझे कामयाबी मिल गयी. मेरी समझ मैं अब  सारी बात आ गयी थी की अम्मी जी शादी से वापस आ कर इतनी चेंज केसे हो गयी हैं. और यह सच है की अब मैं उन की क़िसी बात को नही टालता था. रेहाना ने भी इस बात को महसूसस किया और कई बार पूछा लेकिन मैं टाल देता. और इस सब के बाद यह भी बता दूँ कि इस सारी घटना के 2 साल बाद अम्मी जी का स्वर्गवास हो गया. और मुझे एहसास हुआ यह जो कुछ भी हुआ कितना गलत हुआ. अंत में मुझे यह ही कहना है की हाँ अगर मैं झूठ बोल रहा होता तो मुझे यह इतनी लम्बी बात नही कहनी पड़ती क्योकी झूठ मैं तो ये सब करना बहुत आसान होता है लेकिन हक़ीक़त मैं नहीं और ये सब आप भी जानते हैं. अभी भी मैंने काफ़ी शॉर्ट करके आप को सब कुछ बताया है. और ये सब आप को बताने का मक़सद सिर्फ़ ये है की यह सब बहुत गलत है. आप कभी ऐसा सोचना भी मत मुझसे बस एक भूल हो गयी. जिसकी सज़ा मैं आज भी पा रहा हूँ. तो दोस्तों आपको मेरी यह आपबीती केसी लगी. 

धन्यवाद ..   

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